क्या याद कर पाओगे मेरी कुर्बानी?

मेरा देश जहां एक तरफ गंगा बहती है
और एक तरफ मां अपनी आंखों से गंगा बहाती है
क्या याद कर पाओगे मेरी कुर्बानी?

या अपनी अखबार की
एक खबर सोच भूल जाओगे,
या किसी शहीद की पत्नी के
सिंदूर को, ऐसे ही धुलने दोगे।

मां के लिए कुर्बान है जीवन,
क्या इस जीवन पर गर्व कर पाओगे।
क्या इस कुर्बानी को शरीर का मैल,
समझ मिटा जाओगे।

मैं तो इस शरीर को भारत मां के नाम,
कर तिरंगे में लिपट जाऊंगा,
लेकिन क्या इस शरीर के लिए,
रोने वालों को चुप करवा पाओगे?
क्या मेरी कुर्बानी को याद कर पाओगे?

मेरा शरीर भारत मां के मिट्टी में
मिल जाएगा,
लेकिन वह मां जिसकी गोद
सूनी हो जाती है
लेकिन फिर भी गर्व से सीना चौड़ा कर रह जाती है,
क्या मेरी मां और उनके अभिमान पर गर्व कर पाओगे?
क्या मेरी कुर्बानी को याद कर पाओगे

क्या मेरी मां की गोद, पिता की छांव,
बहन का रूठना, भाई का लड़ना, वह सताना और खुशियां मनाना,
खुशियां लौटा पाओगे?
तो क्यों? फिर क्यों?
किसी व्यक्ति को हम पर प्रश्नचिन्ह उठाने देते हो?

मैं माता का संतान हूं,
इसलिए रक्षा करता रहूंगा..
क्योंकि मैं देश को जोड़ लूंगा ,तोडूंगा नहीं..
मेरे देश क्या याद कर पाओगे, मेरी कुर्बानी?

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